गरियाबंद। जिन गांवों में खदान होती है, माइनिंग होता है, वहां के लोगों की तरक्की और गांव का विकास होता है। गरियाबंद में राजिम तहसील के बासिन और बरभाठा में मौजूद फर्शी पत्थर के खदानों से भी लगा था कि ग्रामीणों की जिंदगी सुधार जाएगी, लेकिन खदान में काम करते-करते हाथ की रेखाएं घिस गई, पर ग्रामीणों की जिंदगी नहीं सुधरी। बायोमेट्रिक मशीन अंगूठे को ट्रेस नहीं कर पा रहा है, जिसके कारण ग्रामीण कई हितग्राही मूलक योजनाओं से वंचित हो गए हैं।

कीचड़ से लथपथ गलियाँ, सड़कों में मौजूद गड्ढे, कहीं पानी की पाइप लाइन फूट गई, तो कहीं गंदगी पसरा हुआ है। ये तस्वीर गरियाबंद के उस नामचीन गांव बासीन और बरभाठा का है, जहां से उच्च किस्म के काला फर्शी पत्थर 200 साल से निकल रहा है। पत्थरों की मांग मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों तक हैं। कारोबार के अनुपात में गांव से सरकार को सालाना करोड़ों का मुनाफा राजस्व के रूप में मिलता है। बावजूद उसके गांव की तस्वीर और ग्रामीणों की तकदीर इस काले पत्थर ने नहीं बदली।

खदानों में काम करते करते थक चुके बूढ़े कंधे अब खदान से निकलने वाले वेस्टेज पत्थर को खरीद कर बजरी बना कर गुजारा करते हैं। 3 हजार परिवार वाले अकेले बासिन में 300 से ज्यादा परिवार बजरी से मिलने वाले मामूली आय पर निर्भर है, तो वहीं गांव की आधी आबादी खदान और उद्योगों में मजदूरी कर अपनी किस्मत बनाने के बजाए किस्मत की रेखाएं घिस रहे हैं।
काम करते नजर आए ग्रामीण लक्ष्मी बाई, कांशीराम चंदेल, भगवती देवी, गायत्री बाई ने बताया कि जिनकी रेखाएँ मिट गई हैं, उनकी आधार की केवायसी नहीं होती। राशन लेने में भी मशक्कत करनी पड़ती है। किस्मत की रेखा को बचाये रखने बूढ़े हाथों को भी मामूली रोजी के लिए रेखाओं को बचाने कई जतन करना पड़ता है। बजरी बनाते समय आँखों को भी खतरा रहता है, कई बार चोट लगने से चश्मा लगाना पड़ता है। उड़ने वाले डस्ट से दमा और फेफड़े खराब होने का डर भी सताता है।
