डोंगरगढ़। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल मां बम्लेश्वरी धाम में रविवार, 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि महोत्सव शुरू होने जा रहा है। एक समय घने जंगल और दुर्गम पहाड़ी के रूप में पहचाने जाने वाले इस क्षेत्र में आज देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस धाम की प्राचीनता, माधवानल-कामकंदला की प्रेमगाथा, राजा विक्रमादित्य से जुड़ी लोककथा और खैरागढ़ राजपरिवार की भूमिका इसके इतिहास को खास बनाती है। मंदिर को व्यवस्थित स्वरूप देने और श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं विकसित करने में मंदिर ट्रस्ट की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है।

माधवानल-कामकंदला की प्रेमकथा से जुड़ा इतिहास
डोंगरगढ़ की धार्मिक पहचान के साथ एक प्राचीन प्रेमकथा भी जुड़ी हुई है। लोकपरंपरा के अनुसार, प्राचीन समय में यहां कामावती नगरी हुआ करती थी, जिसे कामाख्या नगरी के नाम से भी जाना जाता था। इस नगरी के राजा कामसेन को उज्जयनी के राजा विक्रमादित्य का समकालीन बताया जाता है।
कथा के अनुसार, यह नगर कला, नृत्य और संगीत के लिए प्रसिद्ध था। यहां कामकंदला नाम की राज नर्तकी थी, जो अपनी नृत्यकला और सुंदरता के लिए जानी जाती थी। एक दिन राजदरबार में कामकंदला का नृत्य चल रहा था। उसी दौरान माधवानल नाम का संगीतज्ञ वहां पहुंचा। उसे संगीत में गहरी रुचि थी, लेकिन दरबान ने उसे राजदरबार में प्रवेश नहीं करने दिया।

माधवानल बाहर बैठकर ही तबले और घुंघरुओं की आवाज सुनने लगा। कुछ देर बाद उसे महसूस हुआ कि तबले की संगत में त्रुटि है और कामकंदला के घुंघरुओं में से एक में कंकड़ नहीं होने के कारण ताल में अशुद्धि आ रही है। उसने इस पर टिप्पणी की तो बात राजा तक पहुंची। इसके बाद उसे दरबार में बुलाया गया और संगत करने का अवसर मिला।
माधवानल की संगत में कामकंदला ने नृत्य किया तो दरबार में मौजूद लोग मंत्रमुग्ध हो गए। इसी दौरान एक भौंरा कामकंदला के वक्ष पर आकर बैठ गया। नृत्य के बीच उसने अपनी कला से भौंरे को उड़ा दिया, लेकिन माधवानल ने इस घटना को देख लिया था। लोककथा में इसी प्रसंग को दोनों के बीच आकर्षण बढ़ने की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में बताया जाता है। धीरे-धीरे माधवानल और कामकंदला के बीच प्रेम हो गया। यह प्रेम राजकुमार मदनादित्य को पसंद नहीं था।
एक दिन राजदरबार में माधवानल की संगत पर कामकंदला नृत्य कर रही थी। राजा उसकी कला से प्रसन्न हुए और उन्होंने माधवानल को पुरस्कार दिया, लेकिन माधवानल ने वह पुरस्कार कामकंदला को दे दिया। इससे राजा नाराज हो गए और उन्होंने माधवानल को राज्य की सीमा से बाहर जाने का आदेश दे दिया। इस तरह दोनों प्रेमियों को अलग होना पड़ा।
प्रेमियों को मिलाने राजा विक्रमादित्य पहुंचे कामावती
राज्य से निकाले जाने के बाद माधवानल और कामकंदला का मिलना मुश्किल हो गया। ऐसे में माधव ने उज्जयनी के राजा विक्रमादित्य से सहायता मांगी। लोककथा के अनुसार, विक्रमादित्य ने दोनों को न्याय दिलाने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्हें कामावती नगरी के राजा कामसेन से युद्ध करना पड़ा। युद्ध में विक्रमादित्य की जीत हुई और दोनों प्रेमियों के मिलन का रास्ता खुल गया।

कथा का सबसे भावुक प्रसंग इसके बाद आता है। कहा जाता है कि युद्ध जीतने के बाद विक्रमादित्य ने यह जानने के लिए कि माधवानल और कामकंदला का प्रेम कितना सच्चा है, कामकंदला से कहा कि युद्ध में माधवानल की मृत्यु हो गई है। यह सुनते ही कामकंदला ने दुख में तालाब में कूदकर अपने प्राण दे दिए। उसके बाद माधवानल ने भी अपने प्राण त्याग दिए। दोनों की मृत्यु से राजा विक्रमादित्य बहुत दुखी हुए।
लोकमान्यता के अनुसार, इसके बाद विक्रमादित्य ने डोंगरगढ़ में अपनी कुलदेवी आदि शक्ति की घोर तपस्या की। माता भगवती उनकी तपस्या से प्रसन्न हुईं और वरदान मांगने को कहा। राजा ने दोनों प्रेमियों को पुनर्जीवित करने और माता को डोंगरगढ़ में स्थायी निवास देने का वरदान मांगा। इसी कथा को मां बम्लेश्वरी धाम की स्थापना से जोड़कर देखा जाता है।
स्थानीय परंपराओं में माता के लिए विमला देवी और मां बगलामुखी के नामों का उल्लेख भी मिलता है। छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा में माधवानल-कामकंदला की प्रेमगाथा का अपना स्थान है। प्रसिद्ध साहित्यकार स्वर्गीय हरि ठाकुर ने इस किंवदंती को छत्तीसगढ़ की लोककथा माना और इसे ढोला-मारू तथा लोरिक-चंदा जैसी प्रेमगाथाओं के साथ जोड़कर देखने का प्रयास किया।
प्राचीन नाटककार आनंदधर की ओर से संस्कृत में माधवानल नाटक की रचना का उल्लेख मिलता है। वर्ष 1583 में अकबर के दरबारी कवि आलम ने भी इस कथा को पद्यबद्ध किया था। वर्ष 1755 में लिखी गई ‘माधवानल की कथा’ नामक हस्तलिखित पुस्तक के बनारस के एक पुस्तकालय में संग्रहीत होने का उल्लेख है। हिंदी साहित्य कोश में भी प्रेमाख्यान के अंतर्गत माधवानल-कामकंदला की कथा का जिक्र मिलता है।
खैरागढ़ राजपरिवार ने बनवाईं सीढ़ियां
मां बम्लेश्वरी मंदिर को आज जिस स्वरूप में देखा जाता है, उसके विकास में खैरागढ़ रियासत के राजपरिवार की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, करीब दो सौ वर्ष पहले खैरागढ़ रियासत के देवीभक्त राजा कमलनारायण सिंह ने पहाड़ी मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों का निर्माण करवाया था। नीचे स्थित मंदिर के निर्माण का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है।
राजा कमलनारायण सिंह ने माता के कई जसगीत भी लिखे। इसके बाद मंदिर की देखरेख और संरक्षण में खैरागढ़ राजपरिवार की भूमिका बनी रही। देश की आजादी और खैरागढ़ रियासत के भारत में विलय के बाद राजा बीरेन्द्र बहादुर सिंह के दौर में मंदिर के व्यवस्थापन को लेकर नई पहल हुई। बताया जाता है कि उस समय राजा बीरेन्द्र बहादुर सिंह अक्सर खैरागढ़ और दूसरे क्षेत्रों में प्रवास करते रहते थे, जिससे मंदिर की नियमित देखरेख प्रभावित होती थी।
वर्ष 1960 के आसपास मंदिर की जिम्मेदारी एक बैगा परिवार को सौंपी गई थी। उस समय ऊपर मंदिर तक पहुंचने का सुगम रास्ता नहीं था और मंदिर से कोई विशेष आय भी नहीं होती थी। ऐसे में देखरेख में कठिनाई होने पर बैगा परिवार ने राजा साहब से अपनी असमर्थता जताई।
डोंगरगढ़ के बुजुर्गों के अनुसार, राजा बीरेन्द्र बहादुर सिंह अक्सर डोंगरगढ़ में माणिकलाल तापड़िया के यहां पाटे पर बैठकर दरबार लगाया करते थे। इसी दौरान मंदिर की व्यवस्था को बेहतर बनाने और उसके संरक्षण के लिए समिति बनाने की योजना तैयार हुई। राजा साहब ने केदारनाथ अग्रवाल और माणिकलाल तापड़िया को इस दिशा में पहल करने का प्रस्ताव दिया।
1964 में समिति बनी, 1976 में मंदिर ट्रस्ट का पंजीयन
मंदिर के व्यवस्थापन की दिशा में वर्ष 1964 में एक समिति बनाई गई और केदारनाथ अग्रवाल को इसका पहला अध्यक्ष नियुक्त किया गया। वर्ष 1974 में समिति की कमान माणिकलाल तापड़िया को मिली। इसके बाद राजा बीरेन्द्र बहादुर सिंह ने मंदिर के संचालन और संरक्षण के लिए सार्वजनिक ट्रस्ट के गठन की पहल की। वर्ष 1976 में मां बम्लेश्वरी मंदिर ट्रस्ट समिति का पंजीयन कराया गया और उसके संचालन के लिए विधान यानी बायलॉज तैयार किए गए।
इस विधान में समिति की सदस्यता, चुनाव, पूजा-पद्धति और मंदिरों के संचालन से जुड़े नियम तय किए गए। इसमें डोंगरगढ़ के मूल निवासी और सनातन हिंदू धर्म को मानने वाले लोगों को समिति में शामिल करने का प्रावधान रखा गया। राजा बीरेन्द्र बहादुर सिंह ने अपने जीवनकाल तक ट्रस्ट के आजीवन सदस्य बने रहने और उनके बाद दोनों मंदिरों की जिम्मेदारी इसी ट्रस्ट के पास रहने की व्यवस्था भी विधान में दर्ज कराई।
ऊपर पहाड़ी पर पानी की व्यवस्था करने में माणिकलाल तापड़िया के प्रयासों को अहम माना जाता है। मंदिर ट्रस्ट के गठन के बाद वर्ष 1979 में इसका पहला चुनाव हुआ, जिसमें राधाकृष्ण भैया अध्यक्ष निर्वाचित हुए। इसके बाद अलग-अलग समय पर नारायण भाई परमार, बृजरतन भैया, नटवर भाई पटेल, महेंद्र भाई पटेल, पीतांबर स्वामी और नारायण अग्रवाल सहित अन्य लोगों ने ट्रस्ट की जिम्मेदारी संभाली।
उपलब्ध विवरण के अनुसार, नटवर भाई पटेल ने 1994 से जुड़े अपने कार्यकाल सहित तीन कार्यकाल तक अध्यक्ष पद संभाला। बाद के वर्षों में बृजरतन भैया फिर अध्यक्ष बने। वर्ष 2022 से मनोज अग्रवाल ट्रस्ट समिति के अध्यक्ष हैं। मां बम्लेश्वरी धाम के विकास में वर्ष 1994 को महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। इसी साल श्रद्धालुओं को पहाड़ी पर स्थित मंदिर तक पहुंचाने के लिए रोपवे की व्यवस्था शुरू की गई। रोपवे ने विशेष रूप से बुजुर्गों, बच्चों और उन श्रद्धालुओं के लिए दर्शन आसान बनाए, जिन्हें सीढ़ियों से पहाड़ चढ़ने में परेशानी होती है।
सीमित संसाधनों और दुर्गम पहाड़ी से शुरू हुआ यह सफर आज बड़े धार्मिक आयोजनों, विशाल मेलों और देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं की आवाजाही तक पहुंच चुका है। दोनों नवरात्रियों में यहां भव्य मेले का आयोजन होता है और लाखों लोग माता के दर्शन के लिए डोंगरगढ़ पहुंचते हैं।करीब दो हजार से सवा दो हजार वर्ष पुरानी मानी जाने वाली मां बम्लेश्वरी धाम की आस्था आज भी इतिहास, लोककथा और धार्मिक परंपराओं के साथ आगे बढ़ रही है।
माधवानल-कामकंदला की प्रेमगाथा और राजा विक्रमादित्य से जुड़ी किंवदंती इस धाम को एक अलग सांस्कृतिक पहचान देती है, जबकि खैरागढ़ राजपरिवार और मंदिर ट्रस्ट के प्रयासों ने इसे व्यवस्थित तीर्थस्थल के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब शारदीय नवरात्रि के साथ एक बार फिर डोंगरगढ़ माता के जयकारों, ज्योति कलशों की रोशनी और श्रद्धालुओं की आस्था से जगमगाने के लिए तैयार है।
