'OMG': 10 साल बस्तर में खपाए, तबादले की आस में सड़क पर आने को मजबूर पुलिस अफसर, अब तबादले की सुगबुगाहट.

• अब पीएचक्यू में तबादले की सुगबुगाहट तेज.


• एडमिन विभाग में चल रही तैयारी, 30 जून तक लिस्टिंग होने की खबर.


• नक्सलवाद खत्म, लेकिन जवानों की 'सजा' जारी.


• परिवार पूछ रहा— आखिर होगी घर वापसी?


रायपुर. बस्तर में नक्सलवाद की समाप्ति के बाद भी कई सालों से जमे एसआई, टीआई, डीएसपी समेत एडिशनल एसपी रैंक के पुलिस अफसरों की घर वापसी यानी बस्तर से रवानगी की उम्मीद पूरी होने की खबर मिल रही है। 'OMG NEWS NETWORK ' के सूत्रों की माने तो ऐसे अफसरों और उनके परिवार के आंदोलन और चेतावनी के बाद पीएचक्यू के एडमिन विभाग में इन्हें बस्तर से निकालने की तैयारी शुरू हो गई है। मुख्यालय में बैठे बड़े अधिकारी अपनी टीम के साथ लिस्टिंग कर रहे है और सब कुछ ठीक रहा तो इस माह 30 जून तक बस्तर से रवानगी की स्कीम को अमलीजामा पहनाया जा सकता है।


बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे के बाद कई सालों से जमे एसआई, टीआई, डीएसपी समेत एडिशनल एसपी रैंक के अफसरों को बस्तर से बाहर निकालने का रोड़ मैप तैयार किया जा रहा है। 'OMG NEWS NETWORK ' के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार विशेष रूप से 2013 बैच पर मुख्यालय की खास नजर है। घोर नक्सल अभियान और उसके बाद नक्सलवाद के खात्मे के बाद भी बस्तर में जमे पुलिस वालों का बस्तर से बाहर निकलने को लेकर उग्रता और उनके परिवार वालों के सवालों की आग के बाद पुलिस मुख्यालय में इन्हें बस्तर से रवानगी देने की सुगबुगाहट तेज हुई है।


बस्तर आईजी को लेकर इन नामों की चर्चा भी.


नक्सल मुक्त बस्तर में अब रेंज का नया आईजी कौन होगा इस पर भी तरह तरह की चर्चाएं चल रही है। आधिकारिक तौर पर तो नहीं कहा जा सकता लेकिन बस्तर के आईजी पी सुंदर राज के एनआईए में पोस्टिंग होने के बाद सीनियर आईपीएस अजय यादव, बद्री नारायण मीणा और अंकित गर्ग में से किसी एक को बस्तर रेंज का आईजी का चार्ज देने की चर्चा है।


इधर ऐसी खबरें भी आई.


बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ मोर्चा संभालने वाले पुलिस अधिकारी अब अपनी ही व्यवस्था से सवाल पूछ रहे हैं। 10 से 11 वर्षों से लगातार बस्तर में पदस्थ निरीक्षक और उप निरीक्षक स्तर के अधिकारी आज भी तबादले की बाट जोह रहे हैं। हालात यह हैं कि वर्षों से आश्वासन मिलने के बावजूद नई पदस्थापना नहीं होने से अधिकारी और उनके परिवार आंदोलन की राह पर उतरने की तैयारी में हैं।


सवाल जो सामने आए.


▶️ नक्सलवाद लगभग खत्म, फिर भी तबादला नहीं बस्तर में नक्सल गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण और शांति बहाली के बाद भी वर्षों से जमे पुलिस अधिकारियों को अब तक नई पदस्थापना नहीं मिल पाई है।


▶️ 10-11 साल से एक ही जगह ड्यूटी निरीक्षक और उप निरीक्षक स्तर के कई अधिकारी एक दशक से अधिक समय से बस्तर में सेवाएं दे रहे हैं, जबकि सामान्यतः इतनी लंबी अवधि तक एक ही क्षेत्र में पदस्थापना नहीं रहती।


▶️ परिवारों में बढ़ रही नाराजगी लगातार मिल रहे आश्वासनों से परेशान परिवार अब खुलकर विरोध की तैयारी में हैं। चर्चा है कि जल्द ही बड़े आंदोलन की रूपरेखा बनाई जा सकती है।


▶️ शहीदों की कुर्बानी का हवाला 2013 बैच के उप निरीक्षकों ने बस्तर में नक्सलियों से लड़ते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। इनमें मूलचंद कंवर, विनोद कौशिक, रूद्र प्रताप सिंह, श्याम किशोर शर्मा और दीपक भारद्वाज जैसे अधिकारी शामिल हैं।


▶️ 3 साल के लिए भेजे गए थे, 10 साल बाद भी वापसी नहीं वर्ष 2016 में 2013 बैच के उप निरीक्षकों को बिना किसी बांड के तीन वर्षों के लिए बस्तर भेजा गया था। लेकिन एक दशक बाद भी अधिकांश अधिकारी अपने गृह क्षेत्र लौटने का इंतजार कर रहे हैं।


▶️ स्थानांतरण नीति पर उठ रहे सवाल लंबे समय से तबादले नहीं होने के कारण शासन और पुलिस मुख्यालय की स्थानांतरण नीति को लेकर सवाल उठने लगे हैं। अधिकारी पूछ रहे हैं कि आखिर ऐसी कौन-सी मजबूरी है, जिसके कारण वर्षों से लंबित तबादले नहीं हो पा रहे हैं।


▶️ बच्चों के भविष्य पर संकट जून में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत हो रही है। अधिकारी चाहते हैं कि सरकार जल्द फैसला ले ताकि वे अपने बच्चों का नए जिले के स्कूलों में प्रवेश करा सकें।


सीधा सवाल.


"जब बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है, तो फिर एक दशक से अधिक समय से तैनात अधिकारियों को नई जिम्मेदारी देने में आखिर देरी क्यों?"


अंतिम अपील.


पुलिस अधिकारियों और उनके परिवारों ने मुख्यमंत्री, गृह मंत्री और पुलिस महानिदेशक से जल्द निर्णय लेकर अपनी मंशा स्पष्ट करने की मांग की है, ताकि वर्षों से घर वापसी की प्रतीक्षा कर रहे जवानों को राहत मिल सके।





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